ना गुलफाम चाहिए ना सलाम चाहिए
ना मुबारक का पैग़ाम चाहिए  
जिसको पी कर होश उड़ जाये
लबो को ऐसा जाम चाहिए
 
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जिंदा है शाहजहाँ की चाहत अब तक,
गवाह है मुमताज़ की उल्फत अब तक,
जाके देखो ताजमहल को ए दोस्तों,
पथ्थरसे टपकती है मोहब्बत अब तक…
 
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देरी ही सही पर दुरी तो नहीं,
इंतज़ार भला पर जुदाई तो नहीं,
मिलना बिछड़ना तो किस्मत है अपनी,
आखिर इंसान है हम फ़रिश्ते तो नहीं
 
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जब खामोश आँखों से बात होती है
ऐसे ही मोहब्बत की सुरुवात होती है
तुम्हारे ही खयालो में खोये रहते हैं
पता नहीं कब दिन कब रात होती है
 
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